शिव की पूजा

सावन मास में भगवान शंकर की पूजा उनके परिवार के सदस्यों संग करनी चाहिए। इस माह में भगवान शिव के 'रुद्राभिषेक' का विशेष महत्त्व है। इसलिए इस मास में प्रत्येक दिन 'रुद्राभिषेक' किया जा सकता है, जबकि अन्य माह में शिव वास का मुहूर्त देखना पड़ता है।भगवान शिव के रुद्राभिषेक में जल, दूध, दही, शुद्ध घी, शहद, शक्कर या चीनी, गंगाजल तथा गन्ने के रसआदि से स्नान कराया जाता है।अभिषेक कराने के बाद बेलपत्र, शमीपत्र, कुशा तथा दूब आदि से शिवजी को प्रसन्न करते हैं।अंत में भांग, धतूरा तथा श्री फल भोलेनाथ को भोग के रूप में चढा़या जाता है।

शिवलिंग पर बेलपत्र तथा शमीपत्र चढा़ने का वर्णन पुराणों में भी किया गया है।बेलपत्र भोलेनाथ को प्रसन्न करने के शिवलिंग पर चढा़या जाता है।कहा जाता है कि 'आक' का एक फूल शिवलिंग पर चढ़ाने से सोने के दान के बराबर फल मिलता है।हज़ारआक के फूलों कीअपेक्षा एक कनेर का फूल, हज़ार कनेर के फूलों को चढ़ाने की अपेक्षा एक बिल्वपत्र से दान का पुण्य मिल जाता है।हज़ार बिल्वपत्रों के बराबर एक द्रोणयागूमा फूलफलदायी होते हैं।हज़ारगूमा के बराबर एक चिचिड़ा, हज़ार चिचिड़ा के बराबर एक कुशका फूल, हज़ार कुश फूलों के बराबर एक शमीका पत्ता, हज़ार शमीके पत्तों के बराकर एक नीलकमल, हज़ार नीलकमल से ज्यादा एक धतूरा और हज़ार धतूरों से भी ज्यादा एक शमी का फूल शुभ और पुण्य देने वाला होता है।

ऐसी मान्यता है कि भारत की पवित्र नदियों के जल से अभिषेक किए जाने से शिव प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं। 'काँवर' संस्कृत भाषा के शब्द 'कांवांरथी' से बना है।यह एक प्रकार की बहंगी है, जो बाँस की फट्टी से बनाई जाती है। 'काँवर' तब बनती है, जब फूल-माला, घंटी और घुंघरू से सजे दोनों किनारों पर वैदिक अनुष्ठान के साथ गंगाजल का भार पिटारियों में रखा जाता है।धूप-दीप की खुशबू, मुख में 'बोलबम' का नारा, मन में 'बाबा एक सहारा।' माना जाता है कि पहला 'काँवरिया' रावणथा ।श्रीरामने भी भगवान शिव को कांवर चढ़ाई थी।

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